Tuesday, December 19, 2017

राजनीति का नग्न यथार्थ

                  राजनीति का नग्न यथार्थ



         आज देश की युवा पीढ़ी ऐसे दौर से गुजर रही है जिसे अक्सर लोग आधुनिकीकरण के नाम से सुशोभित करते हैंl देश बदल रहा है..... अच्छी बात है...... क्यों ना बदले? आखिर परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है, और न्यूटन बाबा का विज्ञान भी तो यही कहता है। कि 'जो वस्तु गतिमान है वह गति के नियम को धारण करती है।' देश भी गतिमान है, बदल रहा है फिर कुछ विशेष सरकार ने तो देश को अच्छे दिन की फिराक में ऐसा बदल डाला कि उसे स्वयं ही इस बात का भान नहीं है कि चुनाव से पूर्व मैंने जनता से क्या कहा था और मैंने क्या कर डाला है।
         खैर...... सरकार की तो बात ही छोड़िए। यहां तो देश की जनता ही इतनी भोली है कि कुछ एक ढोंगी बाबा की तरह नेता आते हैं, मंत्र की तरह अपनी सोच उन पर डालते हैं और अपनी सोच के तले उनकी सोच को दफन कर देते हैं। जब बात आती है इस भोली जनता की वह तुरंत मान भी लेती है। आखिर करे भी तो क्या? हर बार वही राजनीति के गिने - चुने चेहरे ही सामने आते हैं। उनमें से नीचे के पायदानों में तो बहुतेरे ऐसे मिलेंगे, जिनके ऊपर एक नहीं कई - कई आपराधिक मुकदमे भी लगे होंगे। पर हाय! यह भारतीय राजनीति...... उन्हें भी सितारा बना देती है। अब प्रश्न फिर आता है कि आखिर लोग ऐसे व्यक्ति को अपना राजनेता क्यों चुनें, जिसके आपराधिक मामले सामने हैं। तब इस प्रश्न का समाज के उन लोगों से सीधा संबंध जुड़ जाता है जो भारतीय प्राचीन जातिगत संक्रमण से जूझ रहे हैं या फिर अन्य सामाजिक प्रताड़नाओं बुराइयों से लड़ रहे हैं। जिनमें मुख्यतया गांव की उत्पीड़ितो, दलितों, शोषितों और शहर की झुग्गी - झोपड़ियों की असुरक्षाओं में जी रहा वह वर्ग है, जो सदियों से चली आ रही दास प्रथा, जातिगत व सामाजिक शोषण का प्रत्यक्षदर्शी रहा है।
           प्रश्न पर वापस ध्यान केंद्रित करते हुए कि यह वह वर्ग है जिसने समाज तथा जीवन के ऐसे अनेक शोषित पहलुओं को जिया है, महसूस किया है, तथा कुछ नहीं सिर्फ देखा है। अब उनके सामने राजनीति का वह आतंकित चेहरा सामने आता है जिसके समानांतर कोई विशेष विकल्प नहीं होता। अर्थात बात को सीधे तौर में कहें तो ऐसे प्रत्याशी जिन पर पांच से दस आपराधिक मामले में दर्ज हैं तथा एक जिस पर मात्र एक या दो आपराधिक मामले ही दर्ज हैं, वही लोग विकल्प बन कर सामने आते हैं। ऐसे में उस भोली-भाली जनता के सामने 'अंधों में काना राजा' के चुनाव के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं बचता है। कुछ अन्य कारण भी हैं पर समाज तथा देश की राजनीति के ये सभी आंतरिक पहलू हैं जिन्हें कभी उजागर नहीं किया जाता या फिर यूं कहें कि यह सभी नाभिक के अंदर हो रही उन प्रतिक्रियाओं के समान हैं जिन्हें सिर्फ एक रसायनशास्त्री ही समझ सकता है (तात्पर्य राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों से है) कोई आम व्यक्ति नहीं। समाज के शोषित वर्ग को कुछ इसी प्रकार की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है और वह बेचारे सहन भी करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि वह जिनसे भी शिकायत करेंगे वह भी उन्हीं रसायनशास्त्री की तरह हैं जो उक्त क्रिया प्रतिक्रिया को अंजाम दे रहे हैं।
          भला हो इस लचीले संविधान का और इसके निर्माता का, जिसके सहारे कुछ एक व्यक्ति परिस्थितियों से लड़ने के लिए खड़े होते हैं पर कुछ समय बाद वह भी यहां पर व्याप्त लेट लतीफ कानून व्यवस्था के सामने घुटने टेक देते हैं क्योंकि ऐसी कानून व्यवस्था के साथ उन्हें परिस्थितियों से लड़ने के लिए उनका जीवनकाल भी कम पड़ जाता है।
              कुछ आंतरिक क्रियाओं में ऐसे भी कृत्य शामिल हैं, जिनमें इन शोषित वर्गों, दलितों तथा शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले असुरक्षित लोगों को कई बार ऐसे आपराधिक छवि के नेताओं से नाना प्रकार की धमकियां जैसे कि "यदि तुम वोट नहीं दोगे तो तुम्हें देख लेंगे", (पाठक वर्ग समाज के ऐसे शब्दों का तत्कालीन अर्थ समझता है) "जीतने के बाद तुम्हें यह कर देंगे, वह कर देंगे, योजनाओं​ का लाभ नहीं मिलने देंगे...... इत्यादि इत्यादि। ऐसे तथाकथित समाजसेवी नेताओं के लिए तो बस नेति-नेति है। समाज का वह वर्ग पुनः डर से, भय से उन्हें चुनने पर मजबूर हो जाता है क्योंकि भूत से परिचित है, वर्तमान को देख रहा है और भविष्य (स्वयं व परिवार का) को सुरक्षित रखना है को ध्यान में रखकर अंततः किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में आकर ही ऐसे नेताओं को चुनते हैं। हां..! कुछ एक अपवादों को छोड़कर। इन अपवादों में कुछ एक गिने-चुने निर्दलीय व अन्य नेता निकलकर सामने आते हैं, जिन्होंने देश की राजनीति को कम से कम जिन्दा तो रखा है।
              अब यदि हम उभरते हुए नए भारत में राजनीतिक पार्टियों की बात करें तो वर्तमान भाजपा पार्टी ने अपनी पुरानी तस्वीर छोड़कर नया चोला धारण कर लिया है। जो एक अजेय घोड़े के समान तेजी से आगे बढ़ रही है। सिर्फ अपनी जीत को प्रायिकता देते हुए, नैतिकता और शुचिता का गला घोटकर, समाज के सभी नैतिक मूल्यों पर झूठ की चादर डालकर साथ ही साथ समाज के उन तमाम जातिगत वर्गों​ में जातिवाद तथा धर्म के नाम के घावों पर नमक छिड़क कर वह केवल जीत की कामना करती है। हां..... ठीक है! कहावत भी है कि 'मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है।' पर नैतिकता की दृष्टि से कम से कम एक बार तो इस भोली जनता पर राजनीतिक प्रपंचों के जाल को छोड़ना बंद करो, राजनैतिक शोषण बंद करो, जिसने तुम्हें अपना राजा तथा समाज व देश का उद्धारक चुना है। आप सभी को नैतिक दृष्टि से विचार अवश्य ही करना चाहिए कि आखिर हम सब क्यों इस मानव जीवन के क्षणिक सत्तात्मक सुख के लिए इन करोड़ों व्यक्तियों, जिनका सिर्फ एक ही धर्म है - मनुष्य धर्म  को छोड़कर अवसादग्रस्त, संक्रमित, प्रपंचों व अन्य पाखंडों से परिपूर्ण धर्म ग्रंथों का सहारा लेकर उन्हें बांटते हैं, झगड़े फसाद कराते हैं और बाद में राजनीतिक मंच से खड़े होकर एक स्वर में मुर्गे की भांति आवाज लगाते हैं कि 'हम इस दंगे या घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' अरे साहब कम से कम उस असीम शक्ति रूपी प्रकृति या ईश्वर से तो डरो कि उसे क्या जवाब दोगे। क्योंकि साहब.. उसका तो कोई धर्म नहीं है।
              राजनीति कूटनीति के सहारे ही चलती है। यह अलग बात है पर वर्तमान परिपेक्ष में देखें तो मालूम पड़ता है कि कूटनीति की तो प्रबलता है पर राजनीति स्वयं ही हासिल पर आ खड़ी है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण तो हम देख ही रहे हैं जिसमे अपनी जीत की भूख के पीछे के एक नहीं विभिन्न चुनाव के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। जिसमें ईवीएम मशीन को पूर्णतया सुरक्षित बता कर दूसरे प्रत्याशियों के भी वोट तकनीकी प्रपंचों द्वारा अपने झोली में डाल कर जीत की पताका फहराने की कोशिश में लगे हैं। प्रारंभ के चुनाव की माने तो जनता ईवीएम से परिचित नहीं थी कि कौन सा बटन दबाने पर कहां क्या दिखेगा। धीरे - धीरे जागरूकता बढ़ी है जिसका असर तत्कालीन नगर निकाय चुनाव में दिखा है। जिसके कई वीडियो सामने आए हैं जिसमें लोग अड़ कर खड़े हैं कि आखिर मैं वोट उक्त व्यक्ति को डाल रहा हूं और वह सिर्फ बीजेपी को ही पड़ रहा है ।आखिर कब तक...? खुद विचार करो कि आखिर कब तक इन प्रपंचों के सहारे तानाशाही की सरकार बनाने का ताना - बाना बुनते रहेंगे। एक समय तो आएगा ही जब इसका अंत होगा क्योंकि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। उस वक्त आप की आंखों के सामने अंधेरा छा जाएगा और 'भाइयों और बहनों' उद्घोष के साथ एक सौ इक्कीस करोड़ से अधिक जनता की भीड़ में भी आप अकेले पड़ जाएंगे।
             यदि नैतिकता को छोड़कर प्रत्यक्ष राजनीति की युवाओं के स्तर पर बात करें तो अनेक तथ्य सामने आते हैं। जिनके बारे में सोच कर ही उस मंजर से रूह कांप उठती है। यदि एक नज़र में हम वर्तमान सरकार की नीतियों को देखें तो स्पष्ट पता चलता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जिन पर बच्चों व युवाओं का भविष्य टिका है, वही सरकार की तरफ से सबसे अधिक उपेक्षित है। उत्तर प्रदेश की नई सरकार शिक्षा जैसे बजट में पचास प्रतिशत तक कटौती करती है, तो इसका असर युवा पीढ़ी पर क्या पड़ेगा। यह स्वत: ही समझा जा सकता है। इस सरकार के प्रमुख प्रधानों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा सुरक्षा नियामकों पर पूरजोर से बोला। पर क्या इनमे से किसी पर भी अंकुश लगा? शायद नहीं बस इनका रूप बदल गया है।
           भ्रष्टाचार पहले सीधे तौर पर था पर अब तो न जाने कितनी योजनाएं बनाकर जिन्हें जनहित में बताया जाता है उनके नाम पर अरबों रुपए का बजट पास कर रहे हैं। जरा कोई आम आदमी को यह बताएगा कि सिर्फ योजनाओं के नाम परिवर्तन कर फिर से पेश करना कहां की नीति है। निर्मल गंगा को नमामि गंगे के नाम से स्वच्छता के नाम पर जो बजट पास हुआ, एंटी रोमियो स्क्वायड के नाम पर जो पैसा पास हुआ और अन्य तमाम ऐसी योजनाओं जो युवा और समाज के हितों में सरकारी दस्तावेजों पर दर्ज हैं। उनका बजट कहां है? फिर यह योजनाएं सिर्फ दोबारा चुनावी सरगर्मी बढ़ते ही सफल कार्यों की लिस्ट में होती हैं, इससे पहले न  दिखाई देती और न ही उसका लाभ किसी को मिल रहा होता है। सरकार बनने के बाद अधिकतम राजकीय चयन प्रक्रियाओं​ पर रोक लगा दी गई है। जिसके परिणामस्वरूप युवाओं में बेरोजगारी रूपी ज्वर इतनी तेज बढ़ा है, जिसके बारे में आप लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। उसके विपरीत राज्य के प्रधान जी अन्य राज्यों की चुनावी सरगर्मी में सम्बोधित करते हैं कि "मैंने सरकार बनने के मात्र छ: महिने में छ: लाख युवाओं को रोजगार प्रदान किया है। अरे प्रधान साहब...... यदि ऐसा होता तो आपको मंच पर खड़े होकर बताने की आवश्यकता न होती। यहां की जनता तो इतनी भोली है कि मोबाइल ऐप्स आदि में दस रुपए मिलने पर भी उसे आग की तरह फैला देते हैं, बात जब नौकरी मिलने की होगी। तब क्या होगा आप स्वयं समझ सकते हैं। ध्यान रहे उस वक्त आपको बोलने की आवश्यकता नहीं होगी।
           साहब जरा गौर करिएगा कहीं आपके ही सामने राजनीतिक शोषण से आक्रोशित व त्रस्त, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझता समाज का मेधावी तथा विद्या का धनी युवा वर्ग अनैतिक, आतंकित या सीधे कहे तो आतंकवाद की ओर पलायन कर गया तो? कुछ समय के लिए ही सही,(जब तक इस प्रकार की राजनीति को जड़ से समाप्त नहीं कर देते) पर वह स्थिति बहुत भयावह होगी। क्योंकि आप इस बात को ऐसे अच्छी तरह से समझ सकते हैं जैसे 'कोई इंटेलिजेंस ब्यूरो का व्यक्ति आतंकी संगठन का हेड बन जाए तो क्या मंजर होगा।' ऐसे बहुत से युवा जो पूरे जोश और जुनूनियत से भारतीय प्रशासनिक व प्रादेशिक सेवाओं​ की तैयारी ही करते रह जाते हैं। भर्तियों के रद्द होने से उनका समय भी निकल जाता है। वैसे भी यह युवा वर्ग इन तमाम प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है तभी उनमें से कुछ विभिन्न सामाजिक बुराइयों का सहारा भी ले रहे हैं। जिससे दिन-प्रतिदिन वास्तविक जीवन में अपराधिक मामलों का स्तर भी बढ़ रहा है। यह बात अलग है कि विभिन्न सरकारें अपने अपने कार्यकाल के कम से कम अपराधिक आंकड़ों का प्रदर्शन करती हैं। सिर्फ और सिर्फ अपनी सफेदपोश छवि को औरों से अधिक साफ दिखाने के लिए। पर देश की कागजी कार्यवाही को छोड़ दें तो नग्न यथार्थ को सरकारें और जनता भी जानती है। आज भी कुछ लोग सत्ता के चियरलीडर्स और भक्त इस प्रकार बनकर बैठे हैं कि वे इस नग्न यथार्थ को स्वीकार ही नहीं करना चाहते हैं। जबकि अब समाज के लोगों को दूसरों की रोपित नहीं बल्कि एक स्वतंत्र विचारक​ के रूप में सामने आने की जरूरत है।


                                         प्रेम कुमार
                              काशी हिंदू विश्वविद्यालय
                                         वाराणसी

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