Tuesday, December 19, 2017

राजनीति का नग्न यथार्थ

                  राजनीति का नग्न यथार्थ



         आज देश की युवा पीढ़ी ऐसे दौर से गुजर रही है जिसे अक्सर लोग आधुनिकीकरण के नाम से सुशोभित करते हैंl देश बदल रहा है..... अच्छी बात है...... क्यों ना बदले? आखिर परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है, और न्यूटन बाबा का विज्ञान भी तो यही कहता है। कि 'जो वस्तु गतिमान है वह गति के नियम को धारण करती है।' देश भी गतिमान है, बदल रहा है फिर कुछ विशेष सरकार ने तो देश को अच्छे दिन की फिराक में ऐसा बदल डाला कि उसे स्वयं ही इस बात का भान नहीं है कि चुनाव से पूर्व मैंने जनता से क्या कहा था और मैंने क्या कर डाला है।
         खैर...... सरकार की तो बात ही छोड़िए। यहां तो देश की जनता ही इतनी भोली है कि कुछ एक ढोंगी बाबा की तरह नेता आते हैं, मंत्र की तरह अपनी सोच उन पर डालते हैं और अपनी सोच के तले उनकी सोच को दफन कर देते हैं। जब बात आती है इस भोली जनता की वह तुरंत मान भी लेती है। आखिर करे भी तो क्या? हर बार वही राजनीति के गिने - चुने चेहरे ही सामने आते हैं। उनमें से नीचे के पायदानों में तो बहुतेरे ऐसे मिलेंगे, जिनके ऊपर एक नहीं कई - कई आपराधिक मुकदमे भी लगे होंगे। पर हाय! यह भारतीय राजनीति...... उन्हें भी सितारा बना देती है। अब प्रश्न फिर आता है कि आखिर लोग ऐसे व्यक्ति को अपना राजनेता क्यों चुनें, जिसके आपराधिक मामले सामने हैं। तब इस प्रश्न का समाज के उन लोगों से सीधा संबंध जुड़ जाता है जो भारतीय प्राचीन जातिगत संक्रमण से जूझ रहे हैं या फिर अन्य सामाजिक प्रताड़नाओं बुराइयों से लड़ रहे हैं। जिनमें मुख्यतया गांव की उत्पीड़ितो, दलितों, शोषितों और शहर की झुग्गी - झोपड़ियों की असुरक्षाओं में जी रहा वह वर्ग है, जो सदियों से चली आ रही दास प्रथा, जातिगत व सामाजिक शोषण का प्रत्यक्षदर्शी रहा है।
           प्रश्न पर वापस ध्यान केंद्रित करते हुए कि यह वह वर्ग है जिसने समाज तथा जीवन के ऐसे अनेक शोषित पहलुओं को जिया है, महसूस किया है, तथा कुछ नहीं सिर्फ देखा है। अब उनके सामने राजनीति का वह आतंकित चेहरा सामने आता है जिसके समानांतर कोई विशेष विकल्प नहीं होता। अर्थात बात को सीधे तौर में कहें तो ऐसे प्रत्याशी जिन पर पांच से दस आपराधिक मामले में दर्ज हैं तथा एक जिस पर मात्र एक या दो आपराधिक मामले ही दर्ज हैं, वही लोग विकल्प बन कर सामने आते हैं। ऐसे में उस भोली-भाली जनता के सामने 'अंधों में काना राजा' के चुनाव के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं बचता है। कुछ अन्य कारण भी हैं पर समाज तथा देश की राजनीति के ये सभी आंतरिक पहलू हैं जिन्हें कभी उजागर नहीं किया जाता या फिर यूं कहें कि यह सभी नाभिक के अंदर हो रही उन प्रतिक्रियाओं के समान हैं जिन्हें सिर्फ एक रसायनशास्त्री ही समझ सकता है (तात्पर्य राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों से है) कोई आम व्यक्ति नहीं। समाज के शोषित वर्ग को कुछ इसी प्रकार की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है और वह बेचारे सहन भी करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि वह जिनसे भी शिकायत करेंगे वह भी उन्हीं रसायनशास्त्री की तरह हैं जो उक्त क्रिया प्रतिक्रिया को अंजाम दे रहे हैं।
          भला हो इस लचीले संविधान का और इसके निर्माता का, जिसके सहारे कुछ एक व्यक्ति परिस्थितियों से लड़ने के लिए खड़े होते हैं पर कुछ समय बाद वह भी यहां पर व्याप्त लेट लतीफ कानून व्यवस्था के सामने घुटने टेक देते हैं क्योंकि ऐसी कानून व्यवस्था के साथ उन्हें परिस्थितियों से लड़ने के लिए उनका जीवनकाल भी कम पड़ जाता है।
              कुछ आंतरिक क्रियाओं में ऐसे भी कृत्य शामिल हैं, जिनमें इन शोषित वर्गों, दलितों तथा शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले असुरक्षित लोगों को कई बार ऐसे आपराधिक छवि के नेताओं से नाना प्रकार की धमकियां जैसे कि "यदि तुम वोट नहीं दोगे तो तुम्हें देख लेंगे", (पाठक वर्ग समाज के ऐसे शब्दों का तत्कालीन अर्थ समझता है) "जीतने के बाद तुम्हें यह कर देंगे, वह कर देंगे, योजनाओं​ का लाभ नहीं मिलने देंगे...... इत्यादि इत्यादि। ऐसे तथाकथित समाजसेवी नेताओं के लिए तो बस नेति-नेति है। समाज का वह वर्ग पुनः डर से, भय से उन्हें चुनने पर मजबूर हो जाता है क्योंकि भूत से परिचित है, वर्तमान को देख रहा है और भविष्य (स्वयं व परिवार का) को सुरक्षित रखना है को ध्यान में रखकर अंततः किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में आकर ही ऐसे नेताओं को चुनते हैं। हां..! कुछ एक अपवादों को छोड़कर। इन अपवादों में कुछ एक गिने-चुने निर्दलीय व अन्य नेता निकलकर सामने आते हैं, जिन्होंने देश की राजनीति को कम से कम जिन्दा तो रखा है।
              अब यदि हम उभरते हुए नए भारत में राजनीतिक पार्टियों की बात करें तो वर्तमान भाजपा पार्टी ने अपनी पुरानी तस्वीर छोड़कर नया चोला धारण कर लिया है। जो एक अजेय घोड़े के समान तेजी से आगे बढ़ रही है। सिर्फ अपनी जीत को प्रायिकता देते हुए, नैतिकता और शुचिता का गला घोटकर, समाज के सभी नैतिक मूल्यों पर झूठ की चादर डालकर साथ ही साथ समाज के उन तमाम जातिगत वर्गों​ में जातिवाद तथा धर्म के नाम के घावों पर नमक छिड़क कर वह केवल जीत की कामना करती है। हां..... ठीक है! कहावत भी है कि 'मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है।' पर नैतिकता की दृष्टि से कम से कम एक बार तो इस भोली जनता पर राजनीतिक प्रपंचों के जाल को छोड़ना बंद करो, राजनैतिक शोषण बंद करो, जिसने तुम्हें अपना राजा तथा समाज व देश का उद्धारक चुना है। आप सभी को नैतिक दृष्टि से विचार अवश्य ही करना चाहिए कि आखिर हम सब क्यों इस मानव जीवन के क्षणिक सत्तात्मक सुख के लिए इन करोड़ों व्यक्तियों, जिनका सिर्फ एक ही धर्म है - मनुष्य धर्म  को छोड़कर अवसादग्रस्त, संक्रमित, प्रपंचों व अन्य पाखंडों से परिपूर्ण धर्म ग्रंथों का सहारा लेकर उन्हें बांटते हैं, झगड़े फसाद कराते हैं और बाद में राजनीतिक मंच से खड़े होकर एक स्वर में मुर्गे की भांति आवाज लगाते हैं कि 'हम इस दंगे या घटना की कड़ी निंदा करते हैं।' अरे साहब कम से कम उस असीम शक्ति रूपी प्रकृति या ईश्वर से तो डरो कि उसे क्या जवाब दोगे। क्योंकि साहब.. उसका तो कोई धर्म नहीं है।
              राजनीति कूटनीति के सहारे ही चलती है। यह अलग बात है पर वर्तमान परिपेक्ष में देखें तो मालूम पड़ता है कि कूटनीति की तो प्रबलता है पर राजनीति स्वयं ही हासिल पर आ खड़ी है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण तो हम देख ही रहे हैं जिसमे अपनी जीत की भूख के पीछे के एक नहीं विभिन्न चुनाव के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। जिसमें ईवीएम मशीन को पूर्णतया सुरक्षित बता कर दूसरे प्रत्याशियों के भी वोट तकनीकी प्रपंचों द्वारा अपने झोली में डाल कर जीत की पताका फहराने की कोशिश में लगे हैं। प्रारंभ के चुनाव की माने तो जनता ईवीएम से परिचित नहीं थी कि कौन सा बटन दबाने पर कहां क्या दिखेगा। धीरे - धीरे जागरूकता बढ़ी है जिसका असर तत्कालीन नगर निकाय चुनाव में दिखा है। जिसके कई वीडियो सामने आए हैं जिसमें लोग अड़ कर खड़े हैं कि आखिर मैं वोट उक्त व्यक्ति को डाल रहा हूं और वह सिर्फ बीजेपी को ही पड़ रहा है ।आखिर कब तक...? खुद विचार करो कि आखिर कब तक इन प्रपंचों के सहारे तानाशाही की सरकार बनाने का ताना - बाना बुनते रहेंगे। एक समय तो आएगा ही जब इसका अंत होगा क्योंकि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। उस वक्त आप की आंखों के सामने अंधेरा छा जाएगा और 'भाइयों और बहनों' उद्घोष के साथ एक सौ इक्कीस करोड़ से अधिक जनता की भीड़ में भी आप अकेले पड़ जाएंगे।
             यदि नैतिकता को छोड़कर प्रत्यक्ष राजनीति की युवाओं के स्तर पर बात करें तो अनेक तथ्य सामने आते हैं। जिनके बारे में सोच कर ही उस मंजर से रूह कांप उठती है। यदि एक नज़र में हम वर्तमान सरकार की नीतियों को देखें तो स्पष्ट पता चलता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जिन पर बच्चों व युवाओं का भविष्य टिका है, वही सरकार की तरफ से सबसे अधिक उपेक्षित है। उत्तर प्रदेश की नई सरकार शिक्षा जैसे बजट में पचास प्रतिशत तक कटौती करती है, तो इसका असर युवा पीढ़ी पर क्या पड़ेगा। यह स्वत: ही समझा जा सकता है। इस सरकार के प्रमुख प्रधानों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा सुरक्षा नियामकों पर पूरजोर से बोला। पर क्या इनमे से किसी पर भी अंकुश लगा? शायद नहीं बस इनका रूप बदल गया है।
           भ्रष्टाचार पहले सीधे तौर पर था पर अब तो न जाने कितनी योजनाएं बनाकर जिन्हें जनहित में बताया जाता है उनके नाम पर अरबों रुपए का बजट पास कर रहे हैं। जरा कोई आम आदमी को यह बताएगा कि सिर्फ योजनाओं के नाम परिवर्तन कर फिर से पेश करना कहां की नीति है। निर्मल गंगा को नमामि गंगे के नाम से स्वच्छता के नाम पर जो बजट पास हुआ, एंटी रोमियो स्क्वायड के नाम पर जो पैसा पास हुआ और अन्य तमाम ऐसी योजनाओं जो युवा और समाज के हितों में सरकारी दस्तावेजों पर दर्ज हैं। उनका बजट कहां है? फिर यह योजनाएं सिर्फ दोबारा चुनावी सरगर्मी बढ़ते ही सफल कार्यों की लिस्ट में होती हैं, इससे पहले न  दिखाई देती और न ही उसका लाभ किसी को मिल रहा होता है। सरकार बनने के बाद अधिकतम राजकीय चयन प्रक्रियाओं​ पर रोक लगा दी गई है। जिसके परिणामस्वरूप युवाओं में बेरोजगारी रूपी ज्वर इतनी तेज बढ़ा है, जिसके बारे में आप लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। उसके विपरीत राज्य के प्रधान जी अन्य राज्यों की चुनावी सरगर्मी में सम्बोधित करते हैं कि "मैंने सरकार बनने के मात्र छ: महिने में छ: लाख युवाओं को रोजगार प्रदान किया है। अरे प्रधान साहब...... यदि ऐसा होता तो आपको मंच पर खड़े होकर बताने की आवश्यकता न होती। यहां की जनता तो इतनी भोली है कि मोबाइल ऐप्स आदि में दस रुपए मिलने पर भी उसे आग की तरह फैला देते हैं, बात जब नौकरी मिलने की होगी। तब क्या होगा आप स्वयं समझ सकते हैं। ध्यान रहे उस वक्त आपको बोलने की आवश्यकता नहीं होगी।
           साहब जरा गौर करिएगा कहीं आपके ही सामने राजनीतिक शोषण से आक्रोशित व त्रस्त, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझता समाज का मेधावी तथा विद्या का धनी युवा वर्ग अनैतिक, आतंकित या सीधे कहे तो आतंकवाद की ओर पलायन कर गया तो? कुछ समय के लिए ही सही,(जब तक इस प्रकार की राजनीति को जड़ से समाप्त नहीं कर देते) पर वह स्थिति बहुत भयावह होगी। क्योंकि आप इस बात को ऐसे अच्छी तरह से समझ सकते हैं जैसे 'कोई इंटेलिजेंस ब्यूरो का व्यक्ति आतंकी संगठन का हेड बन जाए तो क्या मंजर होगा।' ऐसे बहुत से युवा जो पूरे जोश और जुनूनियत से भारतीय प्रशासनिक व प्रादेशिक सेवाओं​ की तैयारी ही करते रह जाते हैं। भर्तियों के रद्द होने से उनका समय भी निकल जाता है। वैसे भी यह युवा वर्ग इन तमाम प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है तभी उनमें से कुछ विभिन्न सामाजिक बुराइयों का सहारा भी ले रहे हैं। जिससे दिन-प्रतिदिन वास्तविक जीवन में अपराधिक मामलों का स्तर भी बढ़ रहा है। यह बात अलग है कि विभिन्न सरकारें अपने अपने कार्यकाल के कम से कम अपराधिक आंकड़ों का प्रदर्शन करती हैं। सिर्फ और सिर्फ अपनी सफेदपोश छवि को औरों से अधिक साफ दिखाने के लिए। पर देश की कागजी कार्यवाही को छोड़ दें तो नग्न यथार्थ को सरकारें और जनता भी जानती है। आज भी कुछ लोग सत्ता के चियरलीडर्स और भक्त इस प्रकार बनकर बैठे हैं कि वे इस नग्न यथार्थ को स्वीकार ही नहीं करना चाहते हैं। जबकि अब समाज के लोगों को दूसरों की रोपित नहीं बल्कि एक स्वतंत्र विचारक​ के रूप में सामने आने की जरूरत है।


                                         प्रेम कुमार
                              काशी हिंदू विश्वविद्यालय
                                         वाराणसी

Sunday, January 15, 2017

शिक्षा जगत पर प्रश्न

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को देखकर आज हर युवा कुछ कर गुजरने का जुनून रखता है, वह इसलिए क्योंकि वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर सरकार को स्वयं भरोसा नहीं है| ऐसा कुछ विशेष तथ्यों से स्पष्ट होता है, जैसे शिक्षा की 70% कमान प्राइवेट सेक्टर में होना, जिसके कारण शिक्षा के क्षेत्र में पूर्णतया कालाबाजारी हो रही है,  देश के उनहत्तर प्रतिशत सरकारी कर्मचारी, (जिसमें अधिकारी वर्ग से लेकर शिक्षक वर्ग भी शामिल है) अपने बच्चों को प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाने में शान समझते हैं|
           ऐसे में शिक्षक चयन समिति पर प्रश्न खड़ा करने जैसा है कि क्या वह प्राइमरी स्तर के शिक्षक देश के स्कूलों को नहीं दे पा रहा है जो स्वयं अपने बच्चों को नहीं पढ़ा सकता? ऊपर से आए दिन यही शिक्षक वर्ग अपने शिक्षक धर्म का हवाला देकर अपने वेतन, भत्ते बढ़ाने को लेकर धरना देते हैं| आखिर जब आप पढ़ाने में लापरवाही कर रहे हैं तो अधिक वेतन किसलिए?
     प्रतिवर्ष कितने ही करोड़ शिक्षा के नाम पर खर्च होता है पर देश की साक्षरता मात्र 74.04%  ही है| ग्रामीण क्षेत्र के मात्र दस प्रतिशत छात्र ही उच्चतर शिक्षा ग्रहण कर किसी उच्च पद पर आसीन होगें| जो बहुत ही चिंता का विषय है |
             सरकार को बहुत अधिक दिखावा करने की जरूरत नहीं है बस छोटे से कदम (सभी सरकारी व गैर-सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी, प्राइमरी स्कूल में ही आवश्यक शिक्षा) से पूरे शिक्षा जगत की तस्वीर ही बदल जाएगी| यह कदम भी उठाना किसी स्ट्राइक से कम न होगा लेकिन उज्ज्वल भविष्य के साथ शिक्षा जगत पर फिर कोई प्रश्न नहीं खड़ा कर सकेगा|
                                 छात्र प्रेम कुमार
                            का.हि.वि.वि. वाराणसी

डिजिटल इंडिया- एक मुखौटा

भारत अपने आरंभिक दौर से ही एक विकासशील देश रहा है| विशेषकर पिछले कुछ वर्षों से इस देश ने अपनी मजबूती और टैलेंट से पूरे विश्व को प्रभावित किया है| आज यह देश जिस युवा शक्ति और अपार प्रतिभाओं के साथ आगे बढ़ रहा है, उसके पूर्ण विकास की कल्पना मात्र ही बहुत असाधारण है| आज देश ने अपना पैर डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की ओर बढ़ाया तो है लेकिन इसकी नींव बहुत ही कमजोर है| क्योंकि इस योजना की पहुँच की कल्पना हर एक युवा से लेकर किसान तक की जा रही है पर क्या सरकार किसानों की वास्तविकता से वाकिफ है? शायद नहीं, क्योंकि सरकार तो किसान सिर्फ उसे मानकर मुआवजे और सेवाएँ देने लगती है जिनके पास जमींन है या तो वे जमींदार हैं जबकि वास्तविकता कुछ परे ही होती है| जो भूमिहीन किसान एक साल के लिए रूपये दकर खेती करते हैं, क्या उनकी फसलों का नुकसान नहीं होता? क्या उन्हें उनका हक पाने का अधिकार नहीं है? खेत मालिक तो ऐसी स्थितियों में दोहरा लाभ लेते हैं| वे किसान से एक साल की कीमत तो लेते ही लेते हैं साथ ही आपदाओं के आने पर राहत कोष भी खाली करने में कसर नहीं छोड़ते हैं|
      वहीं दूसरी ओर जब हम युवा शक्ति की बात करते हैं तो उसमें भी शक होने लगता है क्योंकि इसके कर्णाधारों को आज भी बालश्रम की चक्की मे पिसते कोई भी, कहीं भी आसानी से देख सकता है|जहाँ गरीब और गरीब व अमीर और अमीर होता जा रहा हो| बीस हजार वेतन पाने वाला सिपाही देश की सेवा करते हुए भी भारी करों को अदा करता है, वहीं नेता लोग डेढ़ लाख वेतन और घोटालों के बावजूद करों से मुक्त रहते हैं| ऐसी विभिन्न परिस्थितियों में देश को डिजिटल इंडिया का मुखौटा कुछ रास नहीं आता है| ये तो बस चुनावी चोचले हैं कि इस सरकार ने इतनी योजनाएँ आरंभ की इत्यादि| वास्तव में आज तक कितनी योजनाएँ प्रभावी ढंग से किसानों और बालश्रमिकों के हित मे सफल हुई हैं यह तय कर पाना बहुत ही कठिन है|
                                              प्रेम कुमार

कुपोषित भविष्य

ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार उभरती हुई 76 अर्थव्यवस्थाओं मे भारत की 55वीं रैंक है| रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तान मे 19.5 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं |जो दुनिया की कुल भूखी आबादी की लगभग एक चौथाई है|विशेषकर देश के बिमारू (बिहार, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश) कहे जाने वाले राज्य इसके प्रत्यक्ष  उदाहरण हैं| देश मे अनाज की बर्बादी का आलम इस कदर है कि वर्ष 2010-11और 2014-15 के बीच भारतीय खाद्य निगम के गोदामों मे 56,374 टन अनाज बर्बाद हो गया| जबकि इतने अनाज की जरूरत 300,000 भारतीयों को एक वर्ष मे होती है| ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार 2028 तक भारत की अनुमानित आबादी 145 अरब होगी| अगर भंडारण के स्तर मे सुधार और भोजन की उचित व्यवस्था नही की गई तो देश को कुपोषण का केंद्र बनते देर नही लगेगी| जो देश के गहराते संकट को दर्शाता है|
                                      - छात्र प्रेम कुमार

विचारों से परे, ऐतिहासिक कदम

माननीय प्रधानमंत्री जी ने भारतीय मुद्रा के पाँच सौ व एक हजार के नोट के चलन में फेरबदल कर बहुत ही उचित, न्यायिक व जनहित का निर्णय लिया है | इस सरकार द्वारा यह एक अद्भुद व अनूठी पहल है| इससे न सिर्फ काले धन पर शिकंजा कसेगा अपितु समाज में भ्रष्टाचार रहित पारदर्शिता भी स्थापित हो सकेगी | साथ ही उन तमाम भ्रष्ट नेताओं पर भी गाज गिरी है जिन्होंने करोड़ों, अरबों की संपत्ति को कालेधन के रूप में छिपा रखा है | सरकार को गरमागरम में ये भी नकेल कुछ दिनों के लिए लगा देनी चाहिए कि कोई भी एक निश्चित सीमा के ऊपर मँहगी धातु नहीं खरीद सकता, इसका फायदा इस प्रकार होगा कि स्वर्णकारो, व्यापारी आदि के हाँथों कोई भी अपना कालाधन बैंक तक नहीं भेजेगा बल्कि वह स्वयं वहाँ उपस्थित होगा |
          मुद्राओं का रूप बदलने के साथ साथ जनता व सरकार को विशेष रूप से सावधान होने की जरूरत है क्योंकि कुछ अवसरवादी इसे अवसर का रूप समझ कर जनता को गुमराह करने के लिए बाजार में नकली नोट यह कहकर उतार सकते हैं कि "ये नहीं ये वाला है असली नोट |" शुरुआती दौर में बैंकों आदि में विशेष सुरक्षा व निगरानी होनी चाहिए|
         भले ही ये पहल कालेधन पर पूर्णतय: अंकुश न लगा पाए पर कुछ कारगर होगी | अत: मोदी जी का ये कदम अत्यन्त सराहनीय व सम्माननीय है, उन्हें हर एक आम आदमी की तरफ से हार्दिक बधाई.....|
                                    प्रेम कुमार
                       छात्र का.हि.वि.वि. वाराणसी

अनूठी पहल

माननीय प्रधानमंत्री जी ने भारतीय मुद्रा के पाँच सौ व एक हजार के नोट के चलन में फेरबदल कर बहुत ही उचित, न्यायिक व जनहित का निर्णय लिया है | इस सरकार द्वारा यह एक अद्भुद व अनूठी पहल है| इससे न सिर्फ काले धन पर शिकंजा कसेगा अपितु समाज में भ्रष्टाचार रहित पारदर्शिता भी स्थापित हो सकेगी | साथ ही उन तमाम भ्रष्ट नेताओं पर भी गाज गिरी है जिन्होंने करोड़ों, अरबों की संपत्ति को कालेधन के रूप में छिपा रखा है | सरकार को गरमागरम में ये भी नकेल कुछ दिनों के लिए लगा देनी चाहिए कि कोई भी एक निश्चित सीमा के ऊपर मँहगी धातु नहीं खरीद सकता, इसका फायदा इस प्रकार होगा कि स्वर्णकारो, व्यापारी आदि के हाँथों कोई भी अपना कालाधन बैंक तक नहीं भेजेगा बल्कि वह स्वयं वहाँ उपस्थित होगा |
          मुद्राओं का रूप बदलने के साथ साथ जनता व सरकार को विशेष रूप से सावधान होने की जरूरत है क्योंकि कुछ अवसरवादी इसे अवसर का रूप समझ कर जनता को गुमराह करने के लिए बाजार में नकली नोट यह कहकर उतार सकते हैं कि "ये नहीं ये वाला है असली नोट |" शुरुआती दौर में बैंकों आदि में विशेष सुरक्षा व निगरानी होनी चाहिए|
         भले ही ये पहल कालेधन पर पूर्णतय: अंकुश न लगा पाए पर कुछ कारगर होगी | अत: मोदी जी का ये कदम अत्यन्त सराहनीय व सम्माननीय है, उन्हें हर एक आम आदमी की तरफ से हार्दिक बधाई.....|
                                    प्रेम कुमार
                       छात्र का.हि.वि.वि. वाराणसी

ऐतिहासिक कदम

                                              "ऐतिहासिक कदम"
मोदी जी ने पाँच सौ व एक हजार के नोट का स्वरूप बदल कर वर्ष उन्नीस सौ बहत्तर का इतिहास फिर से दोहरा दिया, अंतर सिर्फ ये है कि वर्तमान में इसे एक व्यापक स्तर के कालेधन व भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ मुहिम से जोड़ दिया गया है, जिसने इसे कालेधन के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम बना दिया है| लेकिन मैं और मेरे जैसे कई युवा मोदी सर के इस विचार के खिलाफ हैं कि इससे गरीबी कम होगी, हाँ कम होगी लेकिन देश की गरीबी, सरकार की गरीबी| लेकिन देश के उस गरीब की गरीबी का क्या? क्या वह कम होगी? शायद नहीं ! क्योंकि कालेधन को सफेद करने में तो वे पड़े हैं जिनके पास है, लेकिन उन गरीब किसानों और झोपड़पट्टी वालों का क्या, उन्हें तो बस दो जून की रोटी नसीब हो जाए, उन्हें न तो नोट के स्वरूप बदलने से मतलब है और न ही इसके बंद होने से | फिर नोट के स्वरूप बदलने से इनकी गरीबी दूर होने का सवाल ही नहीं उठता |
        इस कदम पर यदि दूरगामी विचार भी किया जाए कि राजस्व कोष बढ़ने या देश की अर्थव्यवस्था सही होते ही समाज के निम्न वर्ग के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी तो यह मात्र हवा में महल बनाने जैसा होगा| ऐसा इसलिए क्योंकि इसी सरकार की कितनी योजनाएँ चली लेकिन सिर्फ सफल वही रही जिनमें जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी रही जैसे सब्सिडी छोड़कर उज्ज्वला जैसी योजनाओं को सफल बनाना | कुछ को छोड़कर बाकि जगह क्या हो रहा है सिर्फ और सिर्फ नेताओं की जेबों भरने के सिवाय| उदाहरणार्थ एक ग्राम स्तर का ही भ्रष्टाचार देख लीजिए ग्रामप्रधान किसी से भी पैसे ले देकर आवास आवंटित करा देते हैं लेकिन जिसे वास्तव में आवश्यकता होती है वे इनसे अछूते रहते हैं नहीं तो कभी कभी ये लोग भी कुछ पाने की आस से, आवास के लिए मिलने वाली रकम में से कुछ हिस्सा देने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि देश क कानून सच को इंसाफ दिलाते दिलाते ही इंसाफ को दफन कर देता है और उनकी समझ के अनुसार पहुँच न होने के कारण वे अधिकारों के खिलाफ चुनिंदा गंदी राजनीति व कानून से ही शोषित होते रहते हैं| जब एक आम व्यक्ति का कानून व राजनीति में एक विश्वास का सामंजस्य बैठ जाए और इस राजनैतिक गंदगी का सफाया हो जाए तभी सरकार विजयी एवं ऐतिहासिक कदम होगा|
                                   प्रेम कुमार
                      छात्र का.हि.वि.वि. वाराणसी

Saturday, January 14, 2017

दिखावा कब तक

आचार संहिता लागू होने से पूर्व की मानें तो माननीय मुख्यमंत्री जी ने इस बार चुनावी हथियार अपनी विगत वर्षों बीती योजनाओं को बना रहे हैं, दैनिक समाचार पत्रों में जैसे उनके विज्ञापनों के लिए स्थायित्व मिल गया है वो भी बिना पैसों के | प्रतिदिन न जानें कितनी सरकारी राशि इन तमाम चुनावी विज्ञापनों में खर्च की जा रही है, आखिर इस राशि का निजि के स्तर पर खर्च करने का अधिकार कहाँ से व किसके द्वारा मिला है? यह प्रश्न स्वयं में एक यक्ष प्रश्न है| साथ ही मुख्यमंत्री जी अपनी राजनैतिक छवि और सवाँरने के लिए न जानें कितने भ्रामक प्रचार दैनिक समाचार पत्रों में नित्य रूप से दिए जा रहे ह जबकिैं उत्तर प्रदेश के आम जनता के हालात कुछ और ही हैं | यहाँ लोकोक्ति "हाँथी के दाँत खाने के और दिखाने के और" प्रत्यक्ष पर भारी पड़ रही है | ये सारी समाचार पत्रों की प्रतिक्रियाएँ आचार संहिता के कारण कुछ थमी दिख रही हैं अन्यथा मीडिया भी इनका पूरा विशेष पेज ही स्थाई कर रही थी|
अभी तक माननीय जी ने जितनी भी योजनाएँ बनाई हैं उनमें उच्चपदासीन अधिकारियों और नेताओं की जेब भरने के अलावा जनता पर असर न के बराबर दिखा है, (सिर्फ लैपटॉप जैसी योजनाओं को छोड़कर, वो भी जातिवाद पर आधारित वितरण) यदि इन योजनाओं में से सिर्फ पचास प्रतिशत ही आम जनता तक पहुँची होती तो करोड़ों मजदूरों द्वारा एकत्र कर जो सरकारी राशि के रूप में है, उसे माननीय जी को निज के स्तर पर विज्ञापन रूप में खर्च करने की आवश्यकता न पड़ती | माननीय जी को ज्ञात होना चाहिए कि छवि जनकार्यों से होती है न कि विज्ञापनों से |
                                                                                 प्रेम कुमार
                                                                  छात्र का. हि. वि. वि. वाराणसी

Expanding Parliament & Shrinking Democracy

     The ongoing debates around delimitation, women’s reservation, and proposals such as “ One Nation, One Election ” are not isolated refo...