Sunday, February 11, 2018

कड़ी निंदा या फिर मज़ाक

                    कड़ी निंदा या फिर मज़ाक

सुंजवान सैन्य शिविर पर कल सुबह तड़के 4:45 के आस पास जैशे-ए-मोहम्मद के आत्मघाती दस्तों ने हमला किया जिसमें 5 जवान शहीद हो गए.....पर इस हमले की सबसे कायरतापूर्ण पक्ष यह रहा कि इसमें सैनिको के परिवारो को निशाना बनाया गया और इसमें कुछ हद तक वो सफल भी हो गए क्योंकि इस हमले के दौरान एक #JCOसाहेब की बेटी जो स्कूल की छुट्टियों में अपने पिता से मिलने आयी थी, गंभीर रूप से घायल हो गयी है... ..
इस प्रकार के हमले से मुझे कोई आश्चर्य नही होता है लेकिन आश्चर्य तब होता है जब मैं ये देखता हूँ कि सरकार के वो नुमाइंदे जो इसका विरोध कर के सत्ता के तमाम कुर्सियों पर विराजमान है, वो आज निष्क्रियता की सारी हदें पार कर बैठे है....कुछ तथ्यों एवम वादों पे आपका ध्यान ले जाने की कोशिश कर रहा हूँ
1)सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नही मिटने दूंगा मैं देश नही झुकने दूंगा...शायद ये 15-20 फरवरी 2014 के चुनावी प्रचार के दौरान हमारे माननीय प्रधानमंत्री के द्वारा बोली गयी थी..अब इसमें कितनी सार्थकता है ये आप बेहतर समझते है
2) 13 जनवरी 2013 की उस अमानवीय घटना (जहाँ शाहिद सैनिक हेमराज के सर को पाकिस्तानियों के द्वारा बर्बरतापूर्ण क्षतिग्रस्त किया जाना) की निंदा करते हुए तात्कालीन नेता प्रतिपक्ष माननीय सुषमा स्वराज जी ने 1 के बदले 10 सरों की मांग की थी... अब कितने सर आये है...ये हम सब जानते है...!!
3) पिछले 41 दिनों के भीतर 10 जवान शहीद हुए
4) पिछले साढ़े 3 वर्षों में 6 सैन्य शिविर जहाँ सैनिकों की परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा है , को निशाना बनाया गया
5) सिज़ फायर और सैनिको की शहादत 2014 से 2018 आते आते दुगिनी हो गयी है...
लेकिन हां एक बात से हम इनकार नही कर सकते कि सर्जिकल स्ट्राइक और क्रॉस बॉर्डर हंट भी इन्ही 3 वर्षो के अंदर हुई है जो शायद हमे हमारे सेना की कविलियात का प्रत्यक्ष प्रमाण देती है....कश्मीर की राजनीतिक मजबूरियों को दरकिनार कर के अगर सेना को ये आदेश निरंतर अंतराल पे मिलता रहे तो शायद इन हमलों की संभावनाओं को कम किया जा सकता है...पर सवाल ये है कि क्या सत्ता में बैठे वो लोग,  कुर्सी के मोह को त्याग कर के, राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए , निरतंर ये आदेश देते रहेंगे या इन घटनाओ के उपरांत हम #कड़ी_निंदा सुनने के लिए तैयार रहे...!!

                                   ✍️... बादल भैया की कलम से

एक देश - एक चुनाव

                        एक देश - एक चुनाव

        वर्तमान राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में एक देश एक चुनावी विषय बहुत सुर्खियों में है। जनहित कज दृष्टि से बात करें तो चुनावों का मुख्य उद्देश्य सरकार चुनना तथा सरकार के माध्यम से अच्छी गवर्नेंस हासिल करना है, पर वर्तमान राजनैतिक परिपाटी में इन पर धूल पड़ती नज़र आ रही है क्योंकि यँहा की चुनावी प्रक्रिया में किसी न किसी रूप में विकृतियां जन्म लेने लगी हैं।

         हमें अतीत से सीख लेनी चाहिए क्योंकि जिस प्रकिया का हम लागू करने की सोच रहे हैं, वह वर्ष 1952 से 1967 तक देखने को मिलती है। पर मध्यावधि चुनाव व अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के चलते बहुत ही कम समय में इसमे परिवर्तन किया गया। सरकार को ऐसे बड़े फैसले पर न कि सिर्फ आर्थिक दृष्टि से बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी देखना एवं विचार करना आवश्यक है। विशेषतया ऐसे क्षेत्र (उत्तर प्रदेश के पुर्वी क्षेत्रों सहित बिहार और झारखंड के क्षेत्र) जँहा पर आज भी समाज में आतंक के चेहरा जीवित है, वँहा पर छोटे से छोटे चुनावों में भी बात जान माल पर बन पड़ती है। ऐसे में इस विषय पर व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो जरा सोचिए और कल्पना कीजिए कि 'एक देश एक चुनाव' सुनने में जितना अच्छा लग रहा है वह कितना भयावह रूप ले सकता है। उदाहरणस्वरूप जब कोई क्षेत्रीय आतंक के बलबूते चुनावों में जीत दर्ज कराने को सोचता है और वह दुष्कर्म को अंजाम देने मे सफल भी रहता है। उस स्थिति में जब पूरा सरकारी, गैर-सरकारी एवं सुरक्षा व्यवस्थापक चुनावी प्रक्रिया को शान्ति ढंग से सफल बनाने के कयास में लगे होंगे, तब ऐसे वर्ग की आतंकित मानसिकता को समाज के दूसरे पक्ष के प्रति को किस स्तर तक क्षति पहुंचाने का प्रयास करेगी, जैसा कि वर्तमान समय में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। खैर वो बात अलग है कि कोई भक्त वर्ग देखना न चाहे। उदाहरण के तौर पर ऐसे संवेदनशील समय में सरकार व सुरक्षा व्यवस्था का ध्यान समाज के एक क्षेत्र में केन्द्रित कर चुनावी जैसी बड़ी प्रक्रिया में सेंधमारी तथा व्यापक स्तर लोगों की जान पर भी बात आ सकती है।

        माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा कि इससे आर्थिक व राजनैतिक बोझ कम होगा। माननीय राष्ट्रपति जी ने कहा कि इससे अर्थव्यवस्था व मानव संसाधन पर पड़ने वाला बोझ कम होगा। बात तो सौ टके सत्य है पर व्यावहारिक, सैद्धान्तिक तथा जान की हिफाज़त की दृष्टि से (छोटे से छोटे चुनावों के पूर्वांचल, बिहार व झारखंड के अनेकों उदाहरण सामने हैं) अति विचारणीय विषय है। इस विषय पर चुनाव आयोग ने भी बहुत ही सहजता से सहमति यह कहते हुए दर्ज कि की "यदि राजनैतिक पार्टियों को आपत्ति नही है तो हमें भी कोई समस्या नही है।" ध्यान देने की बात है कि राजनैतिक पार्टियों व चुनाव आयोग को तो वैसे भी कोई समस्या नही होती है, होती है तो आम जनता को। फिलहाल अब तो चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त का वेतनमान भी बड़े पैमाने पर बढ़ाते हुए मुख्य न्यायाधीश के बराबर करने का प्रस्ताव है, तब क्या ये वेतन इन्हें चार वर्ष बैठने का दिया जाएगा।  श्रम व अर्थ की दृष्टि से वर्तमान चुनावी प्रक्रिया भले ही जटिल जान पड़ती है, पर इससे संघीय ढांचे में तीन पैरिय स्थिति नहीं जान पड़ती। हाँ, किसी गरीब उम्मीदवार के लिए चुनावी प्रक्रिया में शामिल होना जटिल दिखता है, पर इसे लचीला बनाया जा सकता है। जैसे किसी उम्मीदवार यदि नैतिक दृष्टि से समाजसेवी, ईमानदार व कर्मठता जैसे मूल्य हैं तो फिर उसे स्वभाविक रूप से कम खर्च से ही चुनाव में फतेह हासिल होनी चाहिए, जिसकी निर्धारित सीमाएं अपेक्षाकृत अब भी ज्यादा ही हैं। पिछले चुनावों के आकंड़ों के अनुसार लगभग तीस हजार करोड़ रुपए खर्च हुए - बहुलता देखी जाए और आकलन किया जाए तो ज्यादातर चुनावी व उम्मीदवारों का खर्च राजनैतिक पार्टियों ने वहन किया है। राजनैतिक पार्टियों पर भी चुनाव आयोग तथा सर्वोच्च न्यायालय का शिकंजा कसना चाहिए। फिर देखिएगा - आप जिस जिस आर्थिक बोझ की बात कर रहे हैं एक ही झटके म लगभग तीन गुना काम हो जायेगा। चुनावी व सत्ताधारी पार्टियां ध्यान रखें कि जनता के समक्ष आपके कार्य बोलने चाहिए ताकि जनता स्वयं ही आपको चुने, न कि दूसरे राज्यों तक के चुनावी प्रचार में आपको टीवी चैनलों व भाषणों के द्वारा जनता के सामने हवा और फिर से नए वादों के लड्डू बना के परोसने पड़ेंगे।

       चुनावी प्रक्रिया को यदि मानव संसाधन की दृष्टि से देखें तो न जाने कितने भड़काऊ बयान मिल जाते हैं। एक बात ध्यान देने लायक है तथा इसमें संशोधन कर काफी काफी अमूल - चूल बदलावों के साथ भारी मात्रा में इस क्षेत्र में रोज़गार सृजित हो सकते हैं, क्योंकि वैसे भी टेक्निकल क्षेत्र के युवाओं का रोजगार आधुनिक मशीनें व रोबोट छीन रहे हैं। तब इन युवाओं की ओर सरकार को देखना अति आवश्यक है। चुनावी कार्यों में सरकारी कर्मचारियों के साथ - साथ बहुत बड़ा शिक्षक वर्ग भी शामिल होता है, इन्हें मुक्त करना अति आवश्यक है क्योंकि इससे उक्त विभागीय कार्यों कक कुछ समय के लिए ही सही पर ग्रहण जरूर लग जाता है और इसका अर्थव्यवस्था पर सीधा एवं व्यापक असर दिखाई देता है। इससे सरकार व देश को बड़ी आर्थिक चुनौती से जूझना पड़ता है। आंतरिक कारण यह भी दिखाई देता है कि चुनाव के समय ऐसे कर्मचारियों को दोहरी आय देनी पड़ती है और उक्त क्षेत्र विषयक के कार्य भी रुक जाते हैं।

        ऐसे में जरूरी है कि चुनावी क्षेत्रक में प्रशिक्षण के माध्यम से रोजगार सृजित किये जाएं और एक बार प्रशिक्षित युवा को कम से कम दस वर्षों के लिए चुनावी कार्यों में उचित वेतनमान के साथ रखा जा सकता है। इससे शिक्षा, रोजगार तथा अर्थव्यवस्था के स्तर लर बड़ी क्रांति दिखाई देगी।

चुनाव का मुख्य उद्देश्य सरकार चुनना है तथा उस सरकार से अच्छी गवर्नेंस पोषित होनी चाहिए, जो  संघीय ढांचे को ध्यान में रखकर जनहित में रहकर कार्य करे संकीर्णता में नहीं। चाहे वह सरकार 'एक देश - एक चुनाव' प्रक्रिया से आए या फिर वर्तमान प्रक्रिया से। बशर्ते एक चुनावी प्रक्रिया चुनाव आयोग व देश पर हावी न हो तब तक सब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' है।


                                                 प्रेम कुमार
                                       काशी हिंदू विश्वविद्यालय
                                                 वाराणसी

Expanding Parliament & Shrinking Democracy

     The ongoing debates around delimitation, women’s reservation, and proposals such as “ One Nation, One Election ” are not isolated refo...