आज़ादी के पचहत्तर वर्ष पूर्ण होने का पर्व को पूरा देश आज़ादी के अमृत महोत्सव के रूप मना रहा है। चूंकि यह हमारे लिए गर्व का विषय है इसलिए मनाना भी चाहिए। इस उपलक्ष्य में देश के प्रधानमंत्री जी ने देशवासियों से अपने अपने घरों मे तिरंगा लगा कर 'हर घर तिरंगा' अभियान के के रूप में आज़ादी का अमृत महोत्सव को मनाने का आह्वान किया, अत: इस बाबत 'भारतीय ध्वज संहिता २००२' में आवश्यक बदलाव भी किए गए। ज्ञात है कि तिरंगा हमारी संप्रभुता और भारतीय सामूहिक चेतना का प्रतीक है, इसलिए राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है। बात तिरंगे व देशभक्ति की थी अत: लोगों ने इस अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अपने अपने घरों की छतों, वाहनों और जहाँ भी सम्भव था उस स्थान पर लगाकर उसे सम्मान देने का एक प्रयास मात्र किया। प्रयास मात्र कहना कितना सही है यह समझना आवश्यक है इसलिए पहले यह समझना आवश्यक है कि हमारा 'भारतीय ध्वज संहिता २००२' क्या कहता है? इसमें क्या क्या प्रावधान हैं अथवा थे और उसके किन किन प्रावधानों में क्या क्या बदलाव किया गया है?
राष्ट्रीय ध्वज कब, कहाँ और कैसे फहराया जाता है इसके लिए भारतीय ध्वज संहिता २००२ में बकायदे नियम, कानून और प्रावधान हैं। इस कानून के अनुसार आज़ादी के करीब छ: दशक बाद भी नागरिकों को अपने घरों एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर ध्वज फ़हराने की अनुमति नहीं थी। हाल ही में जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनों मे बदलाव करते हुए लोगों को अपने घरों एवं अन्य स्थलों पर ध्वज फहराने की अनुमति तो दी मगर अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि ध्वज का उपयोग करते वक्त भारतीय ध्वज संहिता २००२ का पालन करना होगा।
इन तमाम कानूनों के बावजूद हम पिछले कई वर्षों से देखते आ रहे हैं कि बाजारों मे प्लास्टिक या पॉलिस्टर से बने झण्डे व्यावसायिक उद्येश्यों से धड़ल्ले से क्रय एवं विक्रय हो रहा था। लेकिन हाल के हुए बदलावों और प्रधानमन्त्री जी के हर घर तिरंगा अभियान के आह्वान के पश्चात तो मानो भारतीय ध्वज संहिता २००२ की आहुति ही चढ़ गई। इस अभियान को जिस देशभक्ति के जोश के साथ साथ ऐच्छिक एवं अनैच्छिक तरीकों से पंक्ति के उस अन्तिम घर तक पहुँचाया गया जहाँ सरकारें ही नहीं बल्कि उनकी योजना तो दूर उस योजना की खबरें भी बमुश्किल ही पहुच पाती हैं। खैर... यहाँ तक कोई चिन्ता का विषय ही नहीं था, यह अभियान चिन्ता का विषय तब बना जब अभियान की लोकप्रियता के साथ, न ही इसमे हुए हुए बदलावों को लोगों तक पहुँचाया गया बल्कि वाहनों/गाड़ियों मे लगे एवं गिरते पड़ते झण्डों को आम नागरिकों के साथ प्रशासन भी सिर्फ़ एक मूक दर्शक बन के देखता रहा। ऐसा नहीं है कि लोगों ने जमीन से उठा कर तिरंगे को किसी सही स्थान पर नहीं रखा या रखा होगा, लेकिन उक्त स्थानों पर रखे जाने के पश्चात कब तक वहाँ रहा? अन्तत: ऐसी कई तस्वीरें सामने आईं जहाँ तिरंगा कचरे के ढेरों मे देखा गया और कई बार तो देश के श्रेष्ठ सम्मानीय सफाई कर्मचारियों ने कचरे के ढेरों से तिरंगे को उठाकर उसका सम्मान किया।वाहनों आदि मे झण्डा लगाने की अनुमति अभी भी नहीं है फिर भी लोग इसे दिखावे और बतौर शौक लगा कर घूम रहे हैं। बात सिर्फ़ यहीं खत्म नहीं होती, घरों के ऊपर लगे हुए राष्ट्रीय ध्वजों के ऊपर धार्मिक व अन्य ध्वजों को बड़ी ही सहजता से लगा और फहरा रखा है। कई बार यह जानकारी के अभाव मे तो कई बार धार्मिक, साम्प्रदायिक और पार्टी की कट्टरता के कारण दिखाई देता है। इसके अलावा घरों और अन्य स्थलों पर लगे हुए झण्डे लगाए जाने के पश्चात ध्यान न देने के कारण हवा के कारण उल्टे सीधे तरीके से टंगे हुए दिखाई देते हैं या पुराने होने के कारण ध्वज के अपमान का कारण बन रहे हैं।
जय हिन्द !
भारतीय ध्वज संहिता का पीडीएफ़ लिंक..👇
https://www.mha.gov.in/sites/default/files/FlagAdvisoryEng_06082021_0.pdf




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