आचार संहिता लागू होने से पूर्व की मानें तो माननीय मुख्यमंत्री जी ने इस बार चुनावी हथियार अपनी विगत वर्षों बीती योजनाओं को बना रहे हैं, दैनिक समाचार पत्रों में जैसे उनके विज्ञापनों के लिए स्थायित्व मिल गया है वो भी बिना पैसों के | प्रतिदिन न जानें कितनी सरकारी राशि इन तमाम चुनावी विज्ञापनों में खर्च की जा रही है, आखिर इस राशि का निजि के स्तर पर खर्च करने का अधिकार कहाँ से व किसके द्वारा मिला है? यह प्रश्न स्वयं में एक यक्ष प्रश्न है| साथ ही मुख्यमंत्री जी अपनी राजनैतिक छवि और सवाँरने के लिए न जानें कितने भ्रामक प्रचार दैनिक समाचार पत्रों में नित्य रूप से दिए जा रहे ह जबकिैं उत्तर प्रदेश के आम जनता के हालात कुछ और ही हैं | यहाँ लोकोक्ति "हाँथी के दाँत खाने के और दिखाने के और" प्रत्यक्ष पर भारी पड़ रही है | ये सारी समाचार पत्रों की प्रतिक्रियाएँ आचार संहिता के कारण कुछ थमी दिख रही हैं अन्यथा मीडिया भी इनका पूरा विशेष पेज ही स्थाई कर रही थी|
अभी तक माननीय जी ने जितनी भी योजनाएँ बनाई हैं उनमें उच्चपदासीन अधिकारियों और नेताओं की जेब भरने के अलावा जनता पर असर न के बराबर दिखा है, (सिर्फ लैपटॉप जैसी योजनाओं को छोड़कर, वो भी जातिवाद पर आधारित वितरण) यदि इन योजनाओं में से सिर्फ पचास प्रतिशत ही आम जनता तक पहुँची होती तो करोड़ों मजदूरों द्वारा एकत्र कर जो सरकारी राशि के रूप में है, उसे माननीय जी को निज के स्तर पर विज्ञापन रूप में खर्च करने की आवश्यकता न पड़ती | माननीय जी को ज्ञात होना चाहिए कि छवि जनकार्यों से होती है न कि विज्ञापनों से |
छात्र का. हि. वि. वि. वाराणसी
No comments:
Post a Comment