Sunday, January 15, 2017

डिजिटल इंडिया- एक मुखौटा

भारत अपने आरंभिक दौर से ही एक विकासशील देश रहा है| विशेषकर पिछले कुछ वर्षों से इस देश ने अपनी मजबूती और टैलेंट से पूरे विश्व को प्रभावित किया है| आज यह देश जिस युवा शक्ति और अपार प्रतिभाओं के साथ आगे बढ़ रहा है, उसके पूर्ण विकास की कल्पना मात्र ही बहुत असाधारण है| आज देश ने अपना पैर डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की ओर बढ़ाया तो है लेकिन इसकी नींव बहुत ही कमजोर है| क्योंकि इस योजना की पहुँच की कल्पना हर एक युवा से लेकर किसान तक की जा रही है पर क्या सरकार किसानों की वास्तविकता से वाकिफ है? शायद नहीं, क्योंकि सरकार तो किसान सिर्फ उसे मानकर मुआवजे और सेवाएँ देने लगती है जिनके पास जमींन है या तो वे जमींदार हैं जबकि वास्तविकता कुछ परे ही होती है| जो भूमिहीन किसान एक साल के लिए रूपये दकर खेती करते हैं, क्या उनकी फसलों का नुकसान नहीं होता? क्या उन्हें उनका हक पाने का अधिकार नहीं है? खेत मालिक तो ऐसी स्थितियों में दोहरा लाभ लेते हैं| वे किसान से एक साल की कीमत तो लेते ही लेते हैं साथ ही आपदाओं के आने पर राहत कोष भी खाली करने में कसर नहीं छोड़ते हैं|
      वहीं दूसरी ओर जब हम युवा शक्ति की बात करते हैं तो उसमें भी शक होने लगता है क्योंकि इसके कर्णाधारों को आज भी बालश्रम की चक्की मे पिसते कोई भी, कहीं भी आसानी से देख सकता है|जहाँ गरीब और गरीब व अमीर और अमीर होता जा रहा हो| बीस हजार वेतन पाने वाला सिपाही देश की सेवा करते हुए भी भारी करों को अदा करता है, वहीं नेता लोग डेढ़ लाख वेतन और घोटालों के बावजूद करों से मुक्त रहते हैं| ऐसी विभिन्न परिस्थितियों में देश को डिजिटल इंडिया का मुखौटा कुछ रास नहीं आता है| ये तो बस चुनावी चोचले हैं कि इस सरकार ने इतनी योजनाएँ आरंभ की इत्यादि| वास्तव में आज तक कितनी योजनाएँ प्रभावी ढंग से किसानों और बालश्रमिकों के हित मे सफल हुई हैं यह तय कर पाना बहुत ही कठिन है|
                                              प्रेम कुमार

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