"ऐतिहासिक कदम"
मोदी जी ने पाँच सौ व एक हजार के नोट का स्वरूप बदल कर वर्ष उन्नीस सौ बहत्तर का इतिहास फिर से दोहरा दिया, अंतर सिर्फ ये है कि वर्तमान में इसे एक व्यापक स्तर के कालेधन व भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ मुहिम से जोड़ दिया गया है, जिसने इसे कालेधन के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम बना दिया है| लेकिन मैं और मेरे जैसे कई युवा मोदी सर के इस विचार के खिलाफ हैं कि इससे गरीबी कम होगी, हाँ कम होगी लेकिन देश की गरीबी, सरकार की गरीबी| लेकिन देश के उस गरीब की गरीबी का क्या? क्या वह कम होगी? शायद नहीं ! क्योंकि कालेधन को सफेद करने में तो वे पड़े हैं जिनके पास है, लेकिन उन गरीब किसानों और झोपड़पट्टी वालों का क्या, उन्हें तो बस दो जून की रोटी नसीब हो जाए, उन्हें न तो नोट के स्वरूप बदलने से मतलब है और न ही इसके बंद होने से | फिर नोट के स्वरूप बदलने से इनकी गरीबी दूर होने का सवाल ही नहीं उठता |
इस कदम पर यदि दूरगामी विचार भी किया जाए कि राजस्व कोष बढ़ने या देश की अर्थव्यवस्था सही होते ही समाज के निम्न वर्ग के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी तो यह मात्र हवा में महल बनाने जैसा होगा| ऐसा इसलिए क्योंकि इसी सरकार की कितनी योजनाएँ चली लेकिन सिर्फ सफल वही रही जिनमें जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी रही जैसे सब्सिडी छोड़कर उज्ज्वला जैसी योजनाओं को सफल बनाना | कुछ को छोड़कर बाकि जगह क्या हो रहा है सिर्फ और सिर्फ नेताओं की जेबों भरने के सिवाय| उदाहरणार्थ एक ग्राम स्तर का ही भ्रष्टाचार देख लीजिए ग्रामप्रधान किसी से भी पैसे ले देकर आवास आवंटित करा देते हैं लेकिन जिसे वास्तव में आवश्यकता होती है वे इनसे अछूते रहते हैं नहीं तो कभी कभी ये लोग भी कुछ पाने की आस से, आवास के लिए मिलने वाली रकम में से कुछ हिस्सा देने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि देश क कानून सच को इंसाफ दिलाते दिलाते ही इंसाफ को दफन कर देता है और उनकी समझ के अनुसार पहुँच न होने के कारण वे अधिकारों के खिलाफ चुनिंदा गंदी राजनीति व कानून से ही शोषित होते रहते हैं| जब एक आम व्यक्ति का कानून व राजनीति में एक विश्वास का सामंजस्य बैठ जाए और इस राजनैतिक गंदगी का सफाया हो जाए तभी सरकार विजयी एवं ऐतिहासिक कदम होगा|
इस कदम पर यदि दूरगामी विचार भी किया जाए कि राजस्व कोष बढ़ने या देश की अर्थव्यवस्था सही होते ही समाज के निम्न वर्ग के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी तो यह मात्र हवा में महल बनाने जैसा होगा| ऐसा इसलिए क्योंकि इसी सरकार की कितनी योजनाएँ चली लेकिन सिर्फ सफल वही रही जिनमें जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी रही जैसे सब्सिडी छोड़कर उज्ज्वला जैसी योजनाओं को सफल बनाना | कुछ को छोड़कर बाकि जगह क्या हो रहा है सिर्फ और सिर्फ नेताओं की जेबों भरने के सिवाय| उदाहरणार्थ एक ग्राम स्तर का ही भ्रष्टाचार देख लीजिए ग्रामप्रधान किसी से भी पैसे ले देकर आवास आवंटित करा देते हैं लेकिन जिसे वास्तव में आवश्यकता होती है वे इनसे अछूते रहते हैं नहीं तो कभी कभी ये लोग भी कुछ पाने की आस से, आवास के लिए मिलने वाली रकम में से कुछ हिस्सा देने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि देश क कानून सच को इंसाफ दिलाते दिलाते ही इंसाफ को दफन कर देता है और उनकी समझ के अनुसार पहुँच न होने के कारण वे अधिकारों के खिलाफ चुनिंदा गंदी राजनीति व कानून से ही शोषित होते रहते हैं| जब एक आम व्यक्ति का कानून व राजनीति में एक विश्वास का सामंजस्य बैठ जाए और इस राजनैतिक गंदगी का सफाया हो जाए तभी सरकार विजयी एवं ऐतिहासिक कदम होगा|
छात्र का.हि.वि.वि. वाराणसी
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