अग्निवीर का अग्निपथ
अग्निवीर योजना की घोषणा होने के बाद से पूरा देश युवाओं के आक्रोश की अग्नि में जल रहा है| क्या युवा वर्ग इस योजना के सही मायनों को समझ पाने या फिर सरकार और सेना मिलकर इन्हें समझा पाने में असफल हैं? आज पूरा देश इस जटिलता से जूझ रहा है और इसका खामयाज़ा पुरे देश को सरकारी और गैर-सरकारी सम्पत्तियों के हो रहे नुकसान से चुकाना पड़ रहा है| सरकार का मानना है कि 'अग्निवीर योजना' लागू होने से देश में अधिक रोजगार सृजन होगा, चार वर्षों के पश्चात पचहत्तर फीसदी अग्निवीर रिटायरमेंट लेकर अन्य सेवाओं में जा सकेंगे (जिसका कोई भी लिखित प्रमाण अभी तक किसी भी राज्य सरकार और न ही भर्ती आयोग से जारी नहीं हुआ है), या फिर लगभग ग्यारह लाख की राशि से जीवन की बेहतर शुरुआत कर सकेंगे|
रक्षा और सुरक्षा विशेषज्ञों की राय मानें तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी चूक साबित हो सकती है| चूँकि यह अग्निवीर पूरी तरह से सेना प्रशिक्षण में कुशल होंगे तो मानवीय स्वभाव के अनुसार आर्थिक लालचों के चलते इनका नक्सली व आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होना भी देश के सामने एक बड़ी चुनौती हो सकती है| राष्ट्रीय सुरक्षा के अंतर्गत गरीबी और बेरोजगारी एक बड़ी समस्याएं हैं अतः भविष्य में बेरोजगारी सम्बन्धी भीड़ हिंसा में यह बेरोजगार अग्निवीर एक देशव्यापी समस्या बन कर उभर सकते हैं, जिन पर पुलिस या प्रशासन द्वारा नियंत्रण पाना भी कठिन होगा||
यदि इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों की बात करें तो निम्न और मध्यम परिवारों से निकलने वाले समाज में युवाओं के अपने घर व गाड़ी, बहन की शादी, भाई की पढाई का खर्च, परिवार का इलाज और न न प्रकार की जरूरतों जैसे सपने (जो की मिलने वाली लगभग राशि से आज के समय में तो संभव है ही नहीं) पुरे न हो पाने से विवाह जैसी सामाजिक परम्पराओं में भी इसका बुरा असर दिखाई दे सकता है और दहेज़ जैसी कुप्रथाओं को एक बार फिर हवा मिल सकती है| साथ ही जो लोग आज इस योजना का पुरजोर समर्थन करते दिखाई दे रहे हैं, कल को वही लोग पचहत्तर फीसदी अग्निवीरों को सिर्फ इस बात के लिए कोसेते हुए मानसिक दबाव बना डालेंगे कि वह सेना के पच्चीस फीसदी में शामिल नहीं हो सका| ऐसे में जब वह अग्निवीर स्वयं ही पच्चीस फीसदी में शामिल नहीं हो पाने के कारण मानसिक परेशानियों से गुजर रहा होगा तब यह सभी बातें आग में घी का काम करेंगी और एक बड़े युवा वर्ग में मानसिक अवसाद जैसी बिमारियों और आत्महत्या जैसी समस्यायों का शिकार हो सकता है||
जो अग्निवीर इन मानसिक अवसादों से बचे तो भविष्य में उनका एक बार फिर से प्रतियोगी परीक्षाओं की भीड़ में शामिल होना तय है क्योंकि किसी भी राज्य की पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के भर्ती बोर्ड भी बिना लिखित परीक्षा के चयन नहीं कर सकते हैं और राज्य सरकारें बिना किसी आधार के इन्हें लुभाने और झूठे सपने दिखाने का काम कर रही हैं| वे अधिक से अधिक पंद्रह से बीस प्रतिशत आरक्षण तय कर सकती हैं पर चयन सुनिश्चित करना भर्ती बोर्ड का काम है| ऐसे में क्या सिर्फ आरक्षण अग्निवीरों का चयन सुनश्चित करता है? या, पुनः बेरोजगारी की भीड़ में शामिल हो जाना है? यह बड़ा प्रश्नचिन्ह उन पचहत्तर फीसदी बाहर हुए अग्निवीरों के सामने फिर से आ जाता है| प्रश्न यही समाप्त नहीं होता, इससे बढ़कर प्राइवेट क्षेत्र के कई बड़े दिग्गज ट्वीट कर अग्निवीरों को वरीयता देने के दावे कर रहे हैं, तो प्रश्न वहां भी बनता है कि क्या इन अग्निवीरों की स्पर्धा पुनः एसआईएस (SIS) और रिलायन्स जैसी बड़ी कंपनियों (गार्ड की ट्रेनिंग संस्थान चला और प्रशिक्षण देने वाली कम्पनियाँ) के प्रतियोगियों से होगी या इनमे शामिल होने के लिए प्रशिक्षण दे रही कंपनियों के चयन प्रक्रिया से पुनः गुजरना पड़ेगा? वर्तमान चयन प्रक्रिया के अनुसार कोई भी कम्पनी बिना चयन प्रक्रिया के नियुक्ति नहीं करती है| अर्थात, उन्हें फिर से सड़कों पर भोर सवेरे आकर पूरी प्रक्रिया से दोबारा गुजरना पड़ेगा और अग्निवीर, जो चार वर्ष पहले बेरोजगारों की भीड़ में शामिल थे वे पुनः उसी कतार में खड़े हो जाएंगे| ऐसे में युवाओं के सामने द्वन्द्व या कहें किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति हो जाती की आखिर चार साल सेना में अग्निवीर की तरह रहने के बाद फिर से बेरोजगारी की भीड़ और सिस्टम की चयन प्रक्रिया में शामिल होना है तो फिर अग्निवीर के रूप में चार वर्ष के इस असमंजस की राह क्यों चुने?
वहीं, दूसरी तरफ यदि एक नज़र भारत के प्राइवेट सिक्योरिटी इंडस्ट्री पर डालें तो पाते हैं कि इसका बाजार २०१६ में लगभग सत्तावन हजार करोड़ का था और वर्ष २०२२ के अंत तक लगभग डेढ़ लाख करोड़ होने की सम्भावना है जो कि बिना अनुशासन और कुशल प्रशिक्षण के संभव नहीं है| कुछ वर्षों पूर्व आई बीडीओ (BDO) और फिक्की (FICCI) की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट सिक्योरिटी इंडस्ट्री भारत में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्रों में से एक है| इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २०१६ में इस क्षेत्र ने लगभग नवासी लाख लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान किए, जो कि तीनों रक्षा सेवाओं से अधिक था| तो क्या इस भीड़ में देश के अग्निवीर फिर से अपने को बेहतर साबित करने के लिए बेरोजगारी की कतार में खड़े होंगे? यदि नहीं, तो जो भी तैयारी है उसे युवाओं के सामने जल्द से जल्द पेश किया जाये ताकि देश को हो रहे इस आर्थिक क्षति से बचाया जा सके| अतः, इस वक्त सरकार को योजना के राष्ट्रहित में सामाजिक, आर्थिक, राष्ट्रीय सुरक्षा और युवाओं के बेहतर भविष्य की दृष्टि से पुनर्वलोकन करना आवश्यक हो जाता है| इस सन्दर्भ में देश के दिवंगत वरिष्ठ रक्षा अधिकारी सीडीएस जनरल विपिन रावत का मत रहा है कि "सेना कभी रोजगार नहीं हो सकती है" और "सेना के जवानों का सेवाकाल अट्ठावन, अधिकारियों व सेना प्रमुखों का सेवाकाल आयु साठ वर्ष तक होनी चाहिए, इससे देश के सेना की क्षमता तथा गुणवत्ता बढ़ेगी और उन्हें कम उम्र में रिटायर होकर समाज या प्राइवेट सिक्योरिटी इंडस्ट्री में मानक से कम वेतन पर ठोकरें नहीं खानी पड़ेगी|" वर्तमान में सरकार की 'अग्निवीर योजना' उनके सिर्फ विचारों के ही विपरीत नहीं बल्कि उनके विचारों, व्यक्तित्व और पूरी सेना का अपमान जान पड़ता है|
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