त्योहारों का नाम सुनते ही सभी के चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है। फिर चाहे वो बच्चों के लिए स्कूलों से अवकाश के बाद की मस्ती हो, युवाओं के लिए कार्यालयों व एक निश्चित दिनचर्या से अवकाश हो या फिर बड़े बुजुर्गों सहित परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ एकत्रित होकर स्वादिष्ट व्यंजनों का भरपूर आनंद और मनोरंजन हो। बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी अपनी सुविधानुसार और बाजारों में पहुँच के अनुरूप खरीदारी भी करते नज़र आते हैं। एक लम्बे अरसे बाद सभी अपने घर आते हैं। एक दूसरे से मिलते हैं, एक दूसरे की शिकायत करते हुए गिले शिकवे दूर करते हैं और जाती धर्म के बंधनों से मुक्त होकर एक दूसरे के घरों मे मिष्ठान व भिन्न भिन्न व्यंजनों का आदान - प्रदान करते हुए नज़र आते हैं। आपको ऐसा लग रहा होगा कि मैं ये सब किस समय की बातें कर रहा हूँ? अब ऐसा कहाँ होता है भाई?
वर्तमान में वस्तुतः ऐसे सामाजिक और राजनैतिक समीकरण बन चुके हैं जहाँ राजनेता व धर्मों के ठेकेदार रूपी परजीवी वर्ग ने पूरी रणनीति, मानसिक अवसादों से ग्रस्त और स्व-हित को केन्द्र में रखते हुए समाज के कुछ ऐसे मानसिक रूप से संक्रमित लोगों को अपनी कठपुतली बना रखा है जो इनके एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। यह वर्ग अब सिर्फ एक समुदाय, जाति या धर्म तक सीमित नहीं है, इसने सारे जातीय और धार्मिक समीकरणों को पीछे छोड़ते हुए बेरोजगारी और अशिक्षा का भी दामन थाम लिया है। जहाँ जरूरतों के लिए धन और जठराग्नि व दो जून के भोजन की पूर्ति के लिए एक बड़ा वर्ग अपनी चेतना के निम्न स्तर पर पहुँच कर वैचारिकता की हत्या कर देता है और व्यक्तिगत पहचान को एक भीड़ का रूप दे देता है। इसी के साथ समाज का एक बड़ा तथाकथित शिक्षित वर्ग या जमात जो विभिन्न प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से डिग्री तो लेकर निकाल रहा है, लेकिन उसकी हालत कुछ ऐसी है कि वो न किसी नौकरी और न ही अपने पारिवारिक रूप से चले आ रहे व्यवसायों में स्थापित कर पा रहे हैं। ऐसे में वे अपने चारो तरफ चल रहे सामाजिक - राजनैतिक चर्चाओं का हिस्सा बनते हैं जहाँ न तो तर्कों के लिए और न ही तथ्यों के लिए कोई जगह होती है, जगह होती है तो सिर्फ धर्म और उन्माद के लिए। ऐसे डिग्रीधारक व तथाकथित शिक्षित युवा ही इन चंद राजनैतिक व धर्म के ठेकेदारों का निशाना बन बस एक कठपुतली बन के रह जाते हैं। ऐसा नहीं है की यह स्थिति सभी युवाओं मे समान है, कई ऐसे युवा हैं जो इस तरह की चर्चाओं को तार्किक रूप से संभाल पाने मे सक्षम होते हैं और कई इन चर्चाओं में भाग न लेने ही अपनी समझदारी मानते हैं। कुछ तथाकथित शिक्षित और डिग्रीधारी युवा एक तरफ से इस अहम से ग्रसित होते हैं कि "अमुक नेता जी, बाबा जी, मौलवी साहब मेरे शिक्षित होने और ज्ञान के कारण मुझे पूछते और मानते हैं।" वास्तव मे ऐसे लोग इन परजीवियों की विचारधाराओं और एजेंडे मे सिर्फ एक उत्प्रेरक का कार्य करते हैं तथा उनके कुटित लक्ष्यों को इनके इशारे पर नाचते हुए पूरा करते हैं। परजीवियों द्वारा एक लम्बे समय तक खुद को इस्तेमाल होने को वे बड़े ही हर्ष से या तो राजनैतिक सफर का संघर्ष मानते हैं या फिर समाज मे एक वर्चस्व स्थापना के रूप मे सहर्ष ही स्वीकार कर लेते हैं। परिणामस्वरूप यही वर्ग अपनी चेतना को दरकिनार कर समाज मे हो रहे धार्मिक उन्मादों का नेतृत्व करता है जहाँ सभी समुदाय, जाति या धर्म खतरे मे होते हैं और सिर्फ इनकी रक्षा का मुद्दा शीर्ष पर होता है। इन्हें न तो सामाजिक और देश के उत्थान मे जरूरी तत्वों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी जरूरतों से मतलब होता है और न ही इन उन्मादों मे हो रहे देश के बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक, सार्वजनिक व निजी संपत्तियों के नुकसान से। बतौर उदाहरण हम पिछले एक दशक हुए धार्मिक दंगों व उन्मादों के साथ - साथ हर पर्व और त्योहारों लगती धारा १४४ को देख सकते हैं। अंतोगत्वा इससे न तो उत्प्रेरक वर्ग और न ही आम जनमानस को लाभ हो रहा है, हो रहा है तो सिर्फ आम जनता का नुकसान। हो भी क्यों न, 'घुन' (गेंहू में होने वाला कीड़ा) जो ठहरा और कीड़ा होना आसान नहीं होता न, इनका अपना परिवार होता है, परिवार का पेट होता है और उसे पालने का धर्म भी होता है। परजीवियों का क्या, न तो परिवार, न भूख की आग न धर्म, बस जहाँ दो पैसे का लाभ दिखा उसके हो लिए। इनकी स्थिति तो ऐसी है कि "चित्त भी मेरी पट्ट भी मेरी, सिक्का मेरे बाप का" (चित्त और पट्ट सिक्के के दो पहलू), अर्थात वे किसी कार्य को स्वयं अंजाम दें या फिर अपनी कठपुतलियों से कराएं लाभ उन्ही का होना है।
कुछ एक वर्षों में हुए इस सामाजिक अस्थिरता को देखते हुए समाज और देश के दूरगामी स्थिति का विचरण कर ही रूह काँप जाती है। अर्थात वह उत्प्रेरक अशिक्षित और बेरोजगार वर्ग जो अस्त्र - शस्त्र विद्या मे बिल्कुल भी निपुण नही है, वह सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए धनार्जन और दो जून के भोजन की पूर्ति के लिए समाज और देश के लिए इतना संक्रमणकारी हो सकता है तो अगले कुछ वर्षों पश्चात चार वर्षों की देश सेवा से निर्मुक्त होकर अस्त्र - शस्त्र विद्या मे निपुण बेरोजगार युवा ऐसे संक्रमक समाज का हिस्सा होगा तो स्थितियाँ क्या होंगी। इसके लिए हम सभी के अपने अपने विवेक व चेतना के स्तर पर आगे आकर समाधान खोजने होंगे और पुनः उसी समाज की स्थापना का संकल्प लेना होगा जहाँ ऐसी स्थितियों का स्तर एकदम निम्न हो क्योंकि पूर्ण आदर्श समाज की स्थापना तो वस्तुतः सम्भव नहीं है। जिसका स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने अपने सर्वेश्वरवाद दर्शन के अन्त मे खण्डन किया है।
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