आज बड़े दिनों बाद दीदी की रसोई मे चाचा से मुलाकात हुई। चाचा से आप 'मेरे चाचा विधायक हैं' वाले मत समझ लीजिएगा, ये वो मुहबोले चाचा हैं जो अक्सर कामकाजी दिनचर्या मे सभी के जीवन में कहीं भी बन जाते हैं। लेकिन इनके तेवर किसी विधायक से कम भी न थे। इनके साथ बैठ के खाने और चाय का पुराना अनुभव पूरे अस्पताल कर्मचारियों के साथ अपने पास भी था, लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने बिहारी अंदाज मे लिट्टी चोखा का ऑर्डर देते हुए मुस्कुराते हुए खैरियत पूछा "क्या हाल चाल हैं प्रेम बाबू, सब कुशल मंगल?"
मैं समझ गया आज फिर इनके दिमाग मे तथाचार्य कुण्डली मार के बैठे हैं। बस फिर क्या, मुझे भी तेनालीराम का अवतार पूरी 5G से अपनाने मे देर न लगी, जैसे सोशल मीडिया पे बस कुछ क्षण में अपना अवतार डाला तो लाइफ झिंगालाला।
चारो तरफ के राजनैतिक माहौल से मैं वाकिफ तो था लेकिन इनके दिमागी अफलातून से थोड़ा सकपकाया और मुस्कुराता हुआ "अरे चाचा आपके, आपके रहते मुझे कुछ हो सकता है क्या।" इतना सुनते ही उनके हाव भाव में गर्व स्पष्ट झलक रहा था, दोपहर के खाने के लिए लिए खचाखच भरे कैंटीन में कुछ क्षणों के लिए इनका सीना छप्पन इंची होने का प्रयास तो किया लेकिन जगह कम होने की वजह से वापस अपनी यथावत स्थिति में आने में देर न लगी।
"अब हमारे वज़ीर-ए-आज़म नोबेल जीते (जीतने) वाले हैं" पूरी गर्मजोशी के साथ टेबल पर हाथ पटकते हुए सभी को सुनाने के लहज़े मे वे बोले।
"क्या?" - मैं उत्सुकतावश चुप न रह सका।
"अरे प्रेम बाबू, आप समाचार वमाचार नहीं पढ़ते हैं क्या? देखिए तो जरा, पिछले दो दिनों से सभी न्यूज वाले भी दिखा रहे हैं और एक आप हैं कि ख़बर तक नहीं है।"
मैंने शान्ति से कुछ क्षण उनकी तरफ देखा, इससे वे असहज तो हुए पर अब पहले से ज्यादा सचेत दिखाई दे रहे थे। "ओह, चलो अच्छा है कि पिछले तीन दिनों में कुछ नहीं हुआ, अब तो तैयारी कर रहे छात्रों को सिर्फ एक ही ख़बर पढ़नी पड़ेगी और पेपर सेट करने वाले को कम ख़बरें होने से प्रश्न बनाने में सहूलियत हो गई" बोल के मैं शांत हो गया।
चाचा कुछ विचलित से लगे पर शायद माहौल ने उन्हें शान्त रहने कि हिदायत दी। तभी कैंटीन का मैनेजर भोजपुरी और हिन्दी का एक साथ रसास्वादन करते हुए "चच्चा, लिट्टी चोखा न हो पाई, कुछ और ले लीजिए" बोलते हुए सामने आ खड़ा हुआ। अब उनसे रहा न गया "तुम यहाँ कर क्या रहे हो, पढ़ने लिखने कि उम्र है, खाना वाना तो वैसे भी नही खिला पा रहे हो जाओ पढ़ाई लिखाई करो और कोई सरकारी नौकरी करो।" आखिर गुस्से को नसीहत मे तब्दील करते हुए बोले और गर्व से लबरेज़ चारो तरफ इस उम्मीद से देखा मानो उनकी इस बात कि तारीफ़ हो रही हो कि कितने सज्जन व्यक्ति हैं जो बिना किसी भेदभाव के सभी का ध्यान रखते हैं।
तभी उसने जवाब दिया "का बात कर रहे हैं चच्चा, पिछले तीन साल से पढ़ रहे हैं फारम (फॉर्म) भरते हैं और जैसे ही पेपर आता है लीक हो जाता है, बच्चा लोग सब भटक रहा है रोजगार के लिए, कुछ बिहार छोड़ के बाहर भाग रहा हैं। बेरोजगारी इतना बढ़ गया गया है और ये मीडिया वाला सब कभी बुलबे नहीं करता है, उपर से ऊलजलूल दिखाता फिरता है।" उसने एक साँस में सारी बात बोल दी।
इतना सुनते ही मुझे हँसी आ गई। अब चाचा ने अपने बड़प्पन के अनुभव का सहारा लेते हुए बोले "ठीक है अभी तो बहुत उम्र है, पढ़ाई करते रहो कुछ न कुछ होगा।"
मैनेजर चाचा से दो कदम आगे ही चल रहा था, चले भी क्यों न चाचा के अनुसार उसकी उम्र ही क्या हुई है, बोला "हम यहाँ किराए पर रहते हैं चच्चा, मकान मालिक ने नए कानून बताते हुए किराया बढ़ा दिया है, गैस, दवा से लेकर दूध सब्बे (सभी) मंहगा खरीद रहे हैं" कहते हुए उनके सामने चाय लाकर रख दिया और बोला "कोचिंग वाले फीस के ऊपर जीएसटी भी ले रहे हैं, बिना भर्ती के दू दू (दो दो) साल तक कोचिंग नहीं कर सकता न चच्चा और हम लोगन (लोगों) की बात मीडिया करता ही नहीं है।"
अबकी पूरी कैंटीन का शान्ति से ठहाके मे तब्दील होने से चाचा झेप गए और शान्त होकर चाय पीने लगे।शायद उन्हें समझ आ रहा था कि उनके तर्क आज हड़ताली मोड़ पर ही छूट गए हैं।
उनके चेहरे के हाव भाव देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता था कि 'वे अच्छे से समझ पा रहे थे कि किस तरह उनकी बढ़ती उम्र और अनुभव के साथ चौथे स्तम्भ का रंग बदलता जा रहा है।' शायद उन्हें ये भी समझ आने लगा था कि 'किस तरह वर्तमान मुख्य धारा का मीडिया प्रश्नों कि जगह माइक में प्रशंसा और स्टूडियो में सत्तारूढ़ दल का प्रतिनिधित्व व प्रचार प्रसार का कार्यभार अपने कन्धों पर ले पूरी तन्मयता से कार्य का निर्वहन कर रहा है।
वक्त का तकाजा देखते हुए मैंने नॉर्वेगियन नोबेल कमेटी के डेप्यूटी लीडर का वीडियो हिन्दी कैपसन के साथ दिखाया, जिसमे इसे सिर्फ एक अफ़वाह मात्र बताया गया था और समझाने का प्रयास भी किया। अब तक चाय खत्म हो चुकी थी, अचानक से चाचा खड़े हुए "ये विदेशी सिर्फ़ अपने देश को बदनाम करना चाहते हैं, वो इतने दूर हैं तो इन्हें क्या पता कि यहाँ अपने देश मे क्या चल रहा है, कौन सा नोबेल मिलने वाला है, सभी न्यूज चैनल एक साथ गलत थोड़े न हो सकते हैं" कहते हुए बिना कुछ खाए सिर्फ़ चाय पी कर कैंटीन से तेजी से बाहर निकल गए। हम सभी उनकी उम्र का तकाजा करते हुए उनकी मासूमियत पर एक दूसरे का चेहरा देख मुस्कुरा ही रहे थे कि तभी एक बन्धु चाचा को बुलाते हुए तेज स्वर में "अरे चाचा अभी सामूहिक माफ़ीनाम सीजन भी अगले चार दिन चलेगा, मिस मत कीजिएगा" बोलते हुए ठहाका लगा कर हँस दिए। लगभग पूरी कैंटीन एक बार फिर हँसी के मारे तनावों से मुक्त, भेदभाव रहित एक हो चुकी थी।
You just wrote it very nicely. Keep it up
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